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चिला-चटनी से शुरु किया कारोबार, अब मेहनत से पा लिया ऐसा मुकाम

चिला-चटनी से शुरु किया कारोबार, अब मेहनत से पा लिया ऐसा मुकाम
सस्ते दाम में चटपटे व्यंजन के साथ पेट भरने के लिए स्वाद का पंचतारा आज बिल्कुल तैयार है।

रायपुर। गरीबी से परिवार की खस्ता हालत, आए दिन आर्थिक तंगी की बेचैनी। परिवार का पेट भरना भी था मुश्किल। किसी तरह से वक्त बिताने की मोहलत और चेहरे पर मायूसी का मंजर…। दो वक्त की रोटी ही मिल जाए कभी… यह भी था मुश्किल, लेकिन हुआ एक दिन कुछ ऐसा कि दम तोड़ गई मायूसी। फिर क्या था हाथों ने यूं दिखाया स्वाद का ऐसा हुनर कि किस्मत की बाजी ही पलट गई।

चिला-चटनी ने मुकाम दिया कि कमाई हजारों में पहुंच गई। गढ़ कलेवा में काम कर रही मोनिशा महिला समूह से जुड़ी महिलाओं की कुछ ऐसी ही कहानी है, जिसने दम तोड़ चुके छत्तीसगढ़ी व्यंजन केंद्र को नए मुकाम तक पहुंचा दिया। सस्ते दाम में चटपटे व्यंजन के साथ पेट भरने के लिए स्वाद का पंचतारा आज बिल्कुल तैयार है।

जहां हर कोई स्वाद के अनुसार पेट भरने को आतुर है। संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के परिसर में चल रहे गढ़ कलेवा में निराश्रित परिवार से महिलाएं भूमिका बांध रही है। परित्यक्ता और विधवा होने की स्थिति में भी हुनरमंद हाथों से हर किसी को व्यंजनों का स्वाद चखाती हैं।

छत्तीसगढ़ी व्यंजनों से ही कमाई 20 हजार रुपए की होती है। बता दें कि किसी समय में राज्य के व्यंजनों के साथ शुरू किए गए गढ़ कलेवा का कांसेप्ट फेल हो चुका था कि इन्हीं गरीब महिलाओं के दल ने समूह बनाकर कमाई के झंडे गाड़े। आज की स्थिति में महंगे रेस्टोरेंट से कहीं बेहतर सस्ते दामों में व्यंजनों चखने का यह सेंटर चर्चित है।

25 तरह के व्यंजन, सबसे खास चिला-चटनी

गढ़ कलेवा में महिला समूह केसदस्य 25 तरह के व्यंजन बनाते हैं, जिसमें सबसे खास चिला रोटी और टमाटर की चटनी है। इसके लिए लंबी लाइनें लगती हैं। छत्तीसगढ़ी व्यंजनों में उड़तबड़ा, दुसका बड़ा, बाड़ापीठा, ठेठरी-कुर्मी, बफौरी पीड़िया और ऐरसा जैसे व्यंजन स्वाद में चार चांद लगाते हैं। व्यंजन बनाने से लेकर इसे बेचने और साफ सफाई का जिम्मा, समूह के सभी सदस्य उठाते हैं।

एक से 10 और 10 से पूरे सौ…

गढ़ कलेवा में कभी इक्का-दुक्का महिलाएं काम करती थीं, लेकिन कारोबार कुछ ऐसा चल पड़ा कि संख्या एक से 10 और 10 से पूरे सौ तक पहुंच गई। आज की स्थिति में काम करने गृहिणियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। छत्तीसगढ़ी व्यंजनों के लिए हाट बाजार में भी सेंटर खोला गया है।

खुद का पेट नहीं भर पा रहे थे, अब हालत सुधरी

इंद्रावती यादव, निवासी रायपुर- 2015 में पति की हार्टअटैक से मौत हो गई। घर में तीन बच्चों की परवरिश करने के साथ पेट भरने नौकरी ढूंढने निकली थी। गढ़ कलेवा के मंच तक पहुंची। यहां खाना बनाने का मौका मिला, आज काउंटर तक संभालती है।

पायल धु्रव, निवासी कुशालपुर- पति मामूली दफ्तर में चपरासी है। परिश्रम से घर का गुजारा मुश्किल था कि गढ़ कलेवा में नौकरी के लिए पहुंची। समूह में जुड़ने का मौका मिला। किचन के साथ दूसरे कामों में हाथ बंटाकर आठ तक की कमाई कर रही है। घर के लिए सहारा बनकर उभरी।

मीना धीवर, रायपुरा- पति को शरीरिक तकलीफ होने की वजह से घर का पेट पालना हो गया था मुश्किल। तीन साल तक भटकने के बाद घर जैसे माहौल में खाना बनाकर देने मिली नौकरी। आज अपने कमाई के दम पर परिवार को संभाला। बच्चों को स्कूल दाखिल कराया।

मंजू अजरिया, रायपुरा- डीएडी की पढ़ाई कर गढ़ कलेवा से जुड़ गई। एक दिन बस गढ़ कलेवा देखने पहुंची थी। महिलाओं का हुनर देखकर वह भी समूह से जुड़ गई। देख-रेख का जिम्मा उठा लिया। पति प्राइवेट नौकरी करते हैं।

भोजन के लिए सस्ता सेंटर

सहायता समूह संचालिका सरिता शर्मा का कहना है- बड़े शहर में सस्ते भोजन के लिए गढ़ कलेवा सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। गरीब तबके से जूझ रही महिलाओं की मेहनत की वजह से रोजाना कारोबार 20 हजार रुपये तक का हो रहा है। 20 रुपये से 100 रुपये तक में तरह-तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं।