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Chhattisgarh में लोकसभा चुनाव में आदिवासी और किसान ही होंगे मुख्य मुद्दा

आदिवासी और किसान दोनों दलों के लिए महत्वपूर्ण, इन्हीं को ध्यान में रखकर बनाई जा रही चुनावी रणनीति।
रायपुर। लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही छत्तीसगढ़ में आदिवासी और किसान फिर राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। यहां विजय उसी को मिलती है जिसके पक्ष में ये दो वर्ग रहें। वैसे तो प्रदेश की आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और दूसरे समूह भी प्रभावी भूमिका में हैं। लेकिन आदिवासियों के लिए चार सीटें आरक्षित हैं और तीन सीटें ऐसी हैं जिनमें उनका व्यापक प्रभाव है।

इसीलिए आदिवासी वोटबैंक कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए अहम है। प्रदेश की 70 फीसद आबादी खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। विधानसभा चुनाव में किसानों ने कांग्रेस को भरपूर समर्थन दिया था। भाजपा को यह खल गया। इसकी प्रतिध्वनि भी सुनाई दी।

प्रदेश सरकार ने कर्ज माफी का एलान किया तो भाजपा के कार्यकर्ता बैंकों के आगे प्रदर्शन करने पहुंच गए। कहा-ऋणमुक्ति का प्रमाणपत्र कहां मिला है। राष्ट्रीयकृत बैंकों का कर्ज कब माफ होगा। किसानों को खाद-बीज तो मिल ही नहीं पा रहा है। सरकार ने धान का समर्थन मूल्य बढ़ाया तो विपक्ष को याद आया कि समर्थन मूल्य बढ़ाने से क्या होगा। सरकार को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के हिसाब से सी-2 फार्मूला लागू करना चाहिए।

आदिवासियों के मामले में सतर्कता से कदम बढ़ा रही है सरकार

छत्तीसगढ़ सरकार नक्सल मामले में बंद आदिवासियों की रिहाई, बस्तर में फर्जी इनकाउंटर, हिंसा की वजह से दूसरे प्रदेशों में विस्थापित हुए आदिवासी आदि मुद्दों पर फूंक-फूंककर कदम उठा रही है। फर्जी ग्राम सभाओं के माध्यम से खनन पट्टे लेने वाली कंपनियों के खिलाफ आदिवासियों ने मोर्चा खोला तो सरकार चुप रही।

वनाधिकार पट्टा का विवाद उठा तो सरकार तुरंत केंद्र की भाजपा सरकार पर हमलावर हो गई। दावा किया कि हमने वकील खड़ा किया तब सुप्रीम कोर्ट ने जंगल से बेदखली के आदेश पर रोक लगाई है।

रह रहकर उभर रहा किसानों का असंतोष

सरकार बनते ही कांग्रेस ने पहला काम किसानों की कर्ज माफी का ही किया। नरवा, गरूवा, घुरवा, बाड़ी योजना के जरिए गांव और किसान को साधने की कवायद शुरू की गई। धान का समर्थन मूल्य बढ़ाया। पर इतना काफी नहीं है। किसान संगठन स्वामीनाथन आयोग की याद दिला रहे हैं जिसका समर्थन पहले कांग्रेस करती रही थी। किसानों की पेंशन योजना लागू नहीं हो पाई।

भाजपा के समय दो साल तक धान का बोनस नहीं दिया गया। चना का बोनस भी बकाया है। यह सब देने का वादा कांग्रेस ने किया था पर हो नहीं पाया है। इससे किसानों को असंतोष व्यक्त करने का बहाना तो मिल ही गया है। चुनाव में इसका कोई असर होगा या राज्य सरकार को किसान और वक्त देंगे यह देखने वाली बात होगी।